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रघुवंशम् • अध्याय 6 • श्लोक 50
संभाव्य भर्तारममुं युवानं मृदुप्रवालोत्तरपुष्पशय्ये । वृन्दावने चैत्ररथादनूने निर्विश्यतां सुन्दरि यौवनश्रीः ॥
हे सुन्दरी! इस युवा को पति मानकर कोमल पुष्पों की शय्या पर, चैत्ररथ के समान रमणीय वृन्दावन में अपने यौवन का आनंद लो।
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