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रघुवंशम् • अध्याय 6 • श्लोक 49
त्रस्तेन तार्क्ष्यात्किल कालियेन मणिं विसृष्टं यमुनौकसा यः । वक्षःस्थलव्यापिरुचं दधानः सकौस्तुभं ह्रेपयतीव कृष्णम् ॥
जिसने यमुना में रहने वाले कालिय नाग द्वारा भयवश छोड़े गए मणि को धारण किया, जिसकी आभा वक्षस्थल पर फैलती है और जो मानो श्रीकृष्ण के कौस्तुभ मणि को भी लज्जित करती है।
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