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रघुवंशम् • अध्याय 6 • श्लोक 44
तस्याः प्रकामं प्रियदर्शनोऽपि न स क्षितीशो रुचये बभूव । शरत्प्रमृष्टाम्बुधरोपरोधः शशीव पर्याप्तकलो नलिन्याः ॥
यद्यपि वह राजा अत्यन्त सुन्दर था, फिर भी वह उसे प्रिय नहीं लगा, जैसे शरद ऋतु में स्वच्छ आकाश में चन्द्रमा भी कमलिनी के लिए पर्याप्त आकर्षक नहीं होता।
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