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रघुवंशम् • अध्याय 6 • श्लोक 14
विस्रस्तमंसादपरो विलासी रत्नानुविद्धाङ्गदकोटिलग्नम् । प्रालम्बमुत्कृष्य यथावकाशं निनाय साचीकृतचारुवक्त्रः ॥
दूसरा विलासी राजा अपने कंधे से ढीले पड़े रत्नजटित बाजूबंद को ऊपर उठाकर ठीक करता हुआ, तिरछी दृष्टि से सुन्दर मुख बनाकर बैठा था।
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