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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 75
इति विरचितवाग्भिर्बन्दिपुत्रैः कुमारः सपदि विगतनिद्रस्तल्पमुज्झांचकार । मदपटुनिनदद्भिर्बोधितो राजहंसैः सुरगज इव गाङ्गं सैकतं सुप्रतीकः ॥
इस प्रकार बंधुओं की वाणी सुनकर कुमार तुरंत जाग उठा और शय्या से उठ गया। मदमत्त हंसों के मधुर शब्दों से जागृत होकर वह ऐसा शोभायमान हुआ जैसे स्वर्ग का हाथी गंगा के तट पर खड़ा हो।
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