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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 74
भवति विरलभक्तिर्म्लानपुष्पोपहारः स्वकिरणपरिवेषोद्भेदशून्याः प्रदीपाः । अयमपि च गिरं नस्त्वत्प्रबोधप्रयुक्ता- मनुवदति शुकस्ते मञ्जुवाक्पञ्जरस्थः ॥
अब पूजा में अर्पित पुष्प मुरझा गए हैं, दीपक अपनी ज्योति खो चुके हैं, और आपका पिंजरे में बैठा मधुर वाणी वाला तोता भी हमारी बातों को दोहराते हुए आपको जगाने का प्रयास कर रहा है।
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