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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 72
शय्यां जहत्युभयपक्षविनीतनिद्राः स्तम्बेरमा मुखरश‍ृङ्खलकर्षिणस्ते । येषां विभाति तरुणारुणरागयोगा- द्भिन्नाद्रिगैरिकतटा इव दन्तकोशाः ॥
आपके हाथी, जिनकी नींद दोनों ओर से खींची जा रही जंजीरों के शब्द से टूट जाती है, उठ खड़े होते हैं। उनके दाँत उगते हुए अरुण रंग से ऐसे चमकते हैं जैसे पर्वतों की लाल मिट्टी की धाराएँ।
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