यावत्प्रतापनिधिराक्रमते न भानुरह्नाय तावदरुणेन तमो निरस्तम् । आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर याते किं वा रिपूंस्तव गुरुः स्वयमुच्छिनत्ति ॥
हे वीर! जैसे सूर्य उदय होने से पहले ही अरुण की आभा अंधकार को दूर कर देती है, वैसे ही जब आप युद्ध में अग्रसर होते हैं, तब क्या आपके शत्रुओं का नाश स्वयं आपके गुरु ही कर देते हैं?
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