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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 70
ताम्रोदरेषु पतितं तरुपल्लवेषु निर्धौतहारगुलिकाविशदं हिमाम्भः आभाति लब्धपरभागतयाधरोष्ठे लीलास्मितं सदशनार्चिरिव त्वदीयम् ॥
लाल पत्तों पर गिरी हुई स्वच्छ ओस की बूंदें जैसे मोतियों के समान चमकती हैं, वैसे ही आपके अधरों पर झलकती हुई मुस्कान दाँतों की आभा से युक्त अत्यन्त मनोहर प्रतीत होती है।
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