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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 69
वृन्ताच्छ्लथं हरति पुष्पमनोकहानां संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नैः । स्वाभाविकं परगुणेन विभातवायुः सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य ॥
वायु जब वृक्षों से पुष्पों को गिराकर और अरुण किरणों से खिले कमलों की सुगंध को मिलाकर बहती है, तब वह मानो आपके मुख की सुगंध पाने की इच्छा से ही सुगंधित हो उठती है।
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