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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 67
निद्रावशेन भवताप्यनवेक्षमाणा पर्युत्सुकत्वमबला निशि खण्डितेव । लक्ष्मीर्विनोदयति येन दिगन्तलम्बी सोऽपि त्वदाननरुचिं विजहाति चन्द्रः ॥
रात्रि में आपकी प्रतीक्षा करती हुई वह नारी (इन्दुमती) भी आपकी ओर देखे बिना ही व्याकुल रही, जैसे खण्डिता नायिका होती है। और वह चन्द्रमा, जो दिशाओं को आलोकित करता है, वह भी आपके मुख की आभा के सामने फीका पड़ जाता है।
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