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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 6
आधारबन्धप्रमुखैः प्रयत्नैः संवर्धितानां सुतनिर्विशेषम् । कच्चिन्न वाय्वादिरुपप्लवो वः श्रमच्छिदामाश्रमपादपानाम् ॥
क्या आपके आश्रम के वे वृक्ष, जिन्हें अत्यन्त परिश्रम से पुत्रों के समान पाला गया है, वायु आदि उपद्रवों से पीड़ित होकर आपकी तपस्या में विघ्न तो नहीं डाल रहे हैं?
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