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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 53
मतङ्गशापादवलेपमूलादवाप्तवानस्मि मतङ्गजत्वम् । अवेहि गन्धर्वपतेस्तनूजं प्रियंवदं मां प्रियदर्शनस्य ॥
अहंकार के कारण मतंग ऋषि के शाप से मुझे हाथी का रूप प्राप्त हुआ था। मुझे गन्धर्वराज प्रियदर्शन का पुत्र प्रियंवद जानो।
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