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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 51
स विद्धमात्रः किल नागरूपमुत्सृज्य तद्विस्मितसैन्यदृष्टः । स्फुरत्प्रभामण्डलमध्यवर्ति कान्तं वपुर्व्योमचरः प्रपेदे ॥
बाण लगते ही उस हाथी ने अपना रूप त्याग दिया और विस्मित सेना के सामने तेजस्वी प्रभामंडल से युक्त एक सुन्दर आकाशचारी रूप धारण कर लिया।
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