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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 43
अथोपरिष्टाद्भ्रमरैर्भ्रमद्भिः प्राक्सूचितान्तःसलिलप्रवेशः । निर्धौतदानामलगण्डभित्तिर्वन्यः सरित्तो गज उन्ममज्ज ॥
तभी ऊपर मंडराते भ्रमरों से पहले ही संकेत पाकर, स्वच्छ और धुले हुए गण्डस्थलों वाला एक वन्य हाथी नदी से बाहर निकला।
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