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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 32
अथोष्ट्रवामीशतवाहितार्थं प्रजेश्वरं प्रीतमना महर्षिः । स्पृशन्करेणानतपूर्वकायं संप्रस्थितो वाचमुवाच कौत्सः ॥
तत्पश्चात् अनेक ऊँटों पर लदे धन को लेकर प्रसन्न मन से कौत्स ने, झुककर राजा को स्पर्श करते हुए, प्रस्थान करते समय यह कहा।
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