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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 25
स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये वसंश्चतुर्थोऽग्निरिवाग्निगारे । द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन् यावद्यते साधयितुं त्वदर्थम् ॥
अतः तुम मेरे इस पूजनीय स्थान में अग्निशाला के चौथे अग्नि के समान निवास करते हुए दो-तीन दिन तक धैर्य धारण करो, जब तक मैं तुम्हारे लिए यह कार्य पूर्ण कर सकूँ।
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