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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 22
सोऽहं सपर्याविधिभाजनेन मत्वा भवन्तं प्रभुशब्दशेषम् । अभ्युत्सहे संप्रति नोपरोद्धुमल्पेतरत्वाच्छ्रुतनिष्क्रयस्य ॥
इसलिए मैं आपको सेवा के योग्य और सच्चे अर्थ में प्रभु मानकर अब अपने इस प्रयत्न को रोकने में समर्थ नहीं हूँ, क्योंकि गुरुदक्षिणा का यह दायित्व अत्यन्त बड़ा है।
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