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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 18
एतावदुक्त्वा प्रतियातुकामं शिष्यं महर्षेर्नृपतिर्निषिध्य । किं वस्तु विद्वन्गुरवे प्रदेयं त्वया कियद्वेति तमन्वयुङ्क्त ॥
इतना कहकर लौटने को उद्यत उस महर्षि के शिष्य को राजा ने रोककर पूछा—हे विद्वान! गुरु को क्या और कितना देना चाहिए?
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