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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 16
स्थाने भवानेकनराधिपः सन्नकिंचनत्वं मखजं व्यनक्ति । पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः कलाक्षयः श्लाघ्यतरो हि वृद्धेः ॥
आप अनेक राजाओं के स्वामी होकर भी यज्ञ के कारण दरिद्रता को धारण कर रहे हैं, यह उचित ही है। जैसे देवताओं द्वारा बार-बार पिए जाने पर चन्द्रमा की कला का क्षय होना भी उसकी वृद्धि से अधिक प्रशंसनीय होता है।
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