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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 15
शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः । आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिः स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ॥
हे नरेन्द्र! आप केवल शरीर से ही यहाँ स्थित प्रतीत होते हैं, आपकी वह समृद्धि नहीं दिखती जो यज्ञों से प्राप्त होती है। जैसे जंगल में उत्पन्न फल समाप्त हो जाने पर केवल डंठल मात्र शेष रह जाता है।
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