इत्यर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य रघोरुदारामपि गां निशम्य । स्वार्थोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशस्तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्यः ॥
इस प्रकार अर्घ्यपात्र से उनके व्यय का अनुमान लगाकर, उदार रघु की स्थिति को समझकर, अपने उद्देश्य की सिद्धि के प्रति निराश हुए वरतन्तु के शिष्य ने उनसे कहा।
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