तवार्हतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे । अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा प्राप्तोऽसि संभावयितुं वनान्माम् ॥
आपके योग्य होते हुए भी आपके दर्शन न कर पाने से मेरा मन तृप्त नहीं है और सेवा करने के लिए उत्सुक है। क्या आप अपने गुरु की आज्ञा से अथवा स्वयं ही वन से यहाँ मुझसे मिलने आए हैं?
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