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रघुवंशम् • अध्याय 5 • श्लोक 1
तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं निःशेषविश्राणितकोशजातम् । उत्पातविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः ॥
विश्वजित् यज्ञ में अपना समस्त धन दान कर चुके उस राजा के पास, उत्पात-विद्या में निपुण और गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से युक्त वरतन्तु के शिष्य कौत्स पहुँचे।
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