न प्रसेहे स रुद्धार्कमधारावर्षदुर्दिनम् । रथवर्त्मरजोऽप्यस्य कुत एव पताकिनीम् ॥
वह उसके द्वारा उत्पन्न धूल से सूर्य के ढँक जाने को भी सह न सका, तो उसकी सेना के ध्वजों का सामना कैसे करता।
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