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रघुवंशम् • अध्याय 4 • श्लोक 65
विनयन्ते स्म तद्योधा मधुभिर्विजयश्रमम् । आस्तीर्णाजिनरत्नासु द्राक्षावलयभूमिषु ॥
उसके योद्धा द्राक्षा के बागों में बिछी मणियों और चमड़ों पर बैठकर मधु पीकर अपने विजय के श्रम को दूर करते थे।
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