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रघुवंशम् • अध्याय 4 • श्लोक 64
अपनीतशिरस्त्राणाः शेषास्तं शरणं ययुः । प्रणिपातप्रतीकारः संरम्भो हि महात्मनाम् ॥
बाकी सैनिक अपने शिरस्त्राण उतारकर उसकी शरण में आए, क्योंकि महात्माओं का क्रोध प्रणाम से ही शांत होता है।
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