परिकल्पितसांनिध्या काले काले च बन्दिषु । स्तुत्यं स्तुतिभिरर्थ्याभिरुपतस्थे सरस्वती ॥
उचित समय पर भाटों की स्तुतियों में उपस्थित होकर सरस्वती स्वयं उसकी प्रशंसा करती हुई प्रतीत होती थी।
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