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रघुवंशम् • अध्याय 4 • श्लोक 46
बलैरध्युषितास्तस्य विजिगीषोर्गतध्वनः । मारीचोद्भ्रान्तहारीता मलयाद्रेरुपत्यकाः ॥
उसकी सेना से भरी हुई और गर्जना से गूँजती मलय पर्वत की घाटियाँ मारीच के भ्रमित स्वर्ण मृग के समान प्रतीत होती थीं।
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