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रघुवंशम् • अध्याय 4 • श्लोक 41
द्विषां विषह्य काकुत्स्थस्तत्र नाराचदुर्दिनम् । सन्मङ्गलस्नात इव प्रतिपेदे जयश्रियम् ॥
वहाँ शत्रुओं के बाणों की वर्षा को सहकर काकुत्स्थ रघु ने मानो मंगलस्नान करके विजयलक्ष्मी प्राप्त की।
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