स ययौ प्रथमं प्राचीं तुल्यः प्राचीनबर्हिषा । अहिताननिलोद्धूतैस्तर्जयन्निव केतुभिः॥
वह पहले पूर्व दिशा की ओर बढ़ा, मानो प्राचीन यज्ञों के समान, और अपने ध्वजों से शत्रुओं को भयभीत करता हुआ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।