हंसश्रेणीषु तारासु कुमुद्वत्सु च वारिषु । विभूतयस्तदीयानां पर्यस्ता यशसामिव ॥
हंसों की पंक्तियों, तारों और जल में खिले कुमुदों में उसकी विभूतियाँ ऐसे फैली थीं जैसे उसका यश।
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