प्रसादसुमुखे तस्मिंश्चन्द्रे च विशदप्रभे । तदा चक्षुष्मतां प्रीतिरासीत्समरसा द्वयोः ॥
उसके प्रसन्न मुख और चन्द्रमा की उज्ज्वल आभा में देखने वालों को समान आनंद प्राप्त होता था।
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