पुण्डरीकातपत्रस्तं विकसत्काशचामरः । ऋतुर्विडम्बयामास न पुनः प्राप तच्छ्रियम् ॥
कमल के समान छत्र और खिले हुए काश के समान चँवरों से युक्त उसका वैभव ऋतु का अनुकरण करता था, परंतु ऋतु भी उस शोभा को प्राप्त न कर सकी।
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