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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 64
ततो निषङ्गादसमग्रमुधृतं सुवर्णपुङ्खद्युतिरञ्जिताङ्गुलिम् । नरेन्द्रसूनुः प्रतिसंहरन्निषुं प्रियंवदः प्रत्यवदत्सुरेश्वरम् ॥
तब राजपुत्र ने तरकश से आधा निकले हुए स्वर्णपंखयुक्त बाण को वापस रखते हुए, विनम्र वचन से इन्द्र को उत्तर दिया।
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