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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 63
असङ्गमद्रिष्वपि सारवत्तया न मे त्वदन्येन विसोढमायुधम् । अवेहि मां प्रीतमृते तुरङ्गमात्किमिच्छसीति स्फुटमाह वासवः ॥
इन्द्र ने स्पष्ट कहा—मेरे इस शक्तिशाली अस्त्र को पर्वत भी नहीं सह सकते, तुम्हारे अतिरिक्त कोई इसे नहीं झेल सका; अश्व के अतिरिक्त तुम जो चाहो, माँगो, मैं प्रसन्न हूँ।
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