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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 56
जहार चान्येन मयूरपत्रिणा शरेण शक्रस्य महाशनिध्वजम् । चुकोप तस्मै स भृशं सुरश्रियः प्रसह्य केशव्यपरोपणादिव ॥
उसने एक अन्य मयूरपंखयुक्त बाण से इन्द्र का ध्वज गिरा दिया, जिससे इन्द्र अत्यंत क्रोधित हो उठा मानो उसकी शोभा ही छीन ली गई हो।
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