दिलीपसूनोः स बृहद्भुजान्तरं प्रविश्य भीमासुरशोणितोचितः । पपावनास्वादितपूर्वमाशुगः कुतूहलेनेव मनुष्यशोणितम् ॥
वह तीव्र बाण दिलीपपुत्र की विशाल भुजा में प्रवेश कर, मानो पहली बार मानव रक्त का स्वाद लेने की जिज्ञासा से उसे पीने लगा।
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