ततः प्रहास्यापभयः पुरन्दरं पुनर्बभाषे तुरगस्य रक्षिता । गृहाण शस्त्रं यदि सर्ग एष ते न खल्वनिर्जित्य रघुं कृती भवान् ॥
तब निर्भय होकर हँसते हुए अश्व का रक्षक रघु ने इन्द्र से कहा—यदि यह तुम्हारा कार्य है तो शस्त्र उठाओ, क्योंकि रघु को जीते बिना तुम सफल नहीं हो सकते।
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