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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 47
इति प्रगल्भं रघुणा समीरितं वचो निशम्याधिपतिर्दिवौकसाम् । निवर्तयामास रथं सविस्मयः प्रचक्रमे च प्रतिवक्तुमुत्तरम् ॥
रघु के इस निर्भीक वचन को सुनकर देवताओं के स्वामी ने आश्चर्यचकित होकर रथ रोक दिया और उत्तर देने लगा।
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