त्रिलोकनाथेन सदा मखद्विषस्त्वया नियम्या ननु दिव्यचक्षुषा । स चेत्स्वयं कर्मसु धर्मचारिणां त्वमन्तरायो भवसि च्युतो विधिः ॥
तुम त्रिलोकी के स्वामी होकर यज्ञ के शत्रुओं को नियंत्रित करते हो, यदि तुम स्वयं ही धर्माचरण करने वालों के कार्यों में बाधा बनो तो यह विधि का उल्लंघन होगा।
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