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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 44
मखांशभाजां प्रथमो मनीषिभिस्त्वमेव देवेन्द्र सदा निगद्यसे । अजस्रदीक्षाप्रयतस्य मद्गुरोः क्रियाविघाताय कथं प्रवर्तसे ॥
हे देवेन्द्र, यज्ञ के भाग पाने वालों में तुम्हें ही श्रेष्ठ कहा जाता है, फिर मेरे गुरु के निरंतर यज्ञ में विघ्न डालने के लिए तुम कैसे प्रवृत्त हो रहे हो।
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