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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 43
शतैस्तमक्ष्णामनिमेषवृत्तिभिर्हरिं विदित्वा हरिभिश्च वाजिभिः । अवोचदेनं गगनस्पृशा रघुः स्वरेण धीरेण निवर्तयन्निव ॥
सैकड़ों अचल दृष्टियों से उस इन्द्र को पहचानकर, घोड़ों सहित आकाश में स्थित रघु ने गंभीर स्वर में उसे मानो रोकते हुए कहा।
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