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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 41
तदङ्कनिस्यन्दनजलेन लोचने प्रमृज्य पुण्येन पुरस्कृतः सताम् । अतीन्द्रियेष्वप्युपपन्नदर्शनो बभूव भावेषु दिलीपनन्दनः ॥
उस धेनु के अंग से झरे पवित्र जल से अपनी आँखें धोकर, सज्जनों द्वारा मान्य दिलीप का पुत्र सूक्ष्म और अदृश्य भावों को भी देखने में समर्थ हो गया।
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