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रघुवंशम् • अध्याय 3 • श्लोक 39
ततः परं तेन मखाय यज्वना तुरंगमुत्सृष्टमनर्गलं पुनः । धनुर्भृतामग्रत एव रक्षिणां जहार शक्रः किल गूढविग्रहः ॥
फिर उस यज्ञ के लिए छोड़े गए अश्व को, धनुर्धरों के सामने ही, इन्द्र ने गुप्त रूप धारण कर चुरा लिया।
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