त्वचं च मेध्यां परिधाय रौरवीमशिक्षतास्त्रं पितुरेव मन्त्रवत् । न केवलं तद्गुरुरेकपार्थिवः क्षितावभूदेकधनुर्धरोऽपि सः ॥
पवित्र रौरवी मृगचर्म धारण कर उसने अपने पिता से ही मंत्र के समान अस्त्रविद्या सीखी और वह न केवल उसका गुरु बना बल्कि पृथ्वी पर अद्वितीय धनुर्धर भी हुआ।
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