प्रजा ने उसके दर्शन की उत्कंठा से, व्रत के कारण कृश हुए शरीर वाले उस राजा को अपनी आँखों से ऐसे देखा जैसे औषधियाँ नवोदित चन्द्रमा को देखती हैं, परंतु तृप्त नहीं हो पातीं।
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