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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 69
स नन्दिनीस्तन्यमनिन्दितात्मा सद्वत्सलो वत्सहुतावशेषम् । पपौ वसिष्ठेन कृताभ्यनुज्ञः शुभ्रं यशोमूर्तमिवातितृष्णः ॥
निर्दोष आत्मा और बछड़े से प्रेम रखने वाला वह राजा, वसिष्ठ की अनुमति से बछड़े के लिए छोड़े गए दूध का शेष भाग पीने लगा, मानो वह श्वेत यशरूप अमृत हो।
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