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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 67
इत्थं क्षितीशेन वसिष्ठधेनुर्विज्ञापिता प्रीततरा बभूव । तदन्विता हैमवताच्च कुक्षेः प्रत्याययावाश्रममश्रमेण ॥
इस प्रकार राजा द्वारा निवेदन किए जाने पर वसिष्ठ की धेनु और भी प्रसन्न हुई और उसके साथ हिमालय की गुफा से बिना कष्ट के आश्रम लौट आई।
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