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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 64
ततः समानीय स मानितार्थी हस्तौ स्वहस्तार्जितवीरशब्दः । वंशस्य कर्तारमनन्तकीर्तिं सुदक्षिणायां तनयं ययाचे ॥
तब संतुष्ट होकर, अपने पराक्रम से यश प्राप्त करने वाला वह राजा हाथ जोड़कर सुदक्षिणा से उत्पन्न होने वाले, अनंत कीर्ति वाले वंशवर्धक पुत्र की याचना करने लगा।
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